श्रम की महिमा

श्रम की महिमा (16/13)
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श्रम की महिमा क्या बतलाऊँ,
                         श्रम से ही संसार है।
श्रम से ही फल मीठा मिलता,
                    श्रम जीवन आधार है।।

श्रम न रहे गर तो क्या होगा,
                        ऊँचे बाँध ढलान का।
बड़े-बड़े पुल-सड़क कहाँ से,
                      कैसे स्वप्न मकान का।।
श्रम से ही उद्योग हमारा,
                        श्रम से ही व्यापार है।
श्रम की महिमा क्या बतलाऊँ............

हल न चलें खेतों में सोंचों,
                   सोने का फिर तोल क्या।
भूखी मर जायेगी दुनिया,
                 पानी का फिर मोल क्या।।
मेहनती इंसान वही है,
                      जिसमें  धैर्य  अपार है।
श्रम की महिमा क्या बतलाऊँ.............

श्रम की पूजा जो हैं करते,
                        खुश होते भगवान है।
खून पसीने से धरती को,
                         सींचे वही महान है।।
श्रम से ही धरती हरियाली,
                         पतझड़ बने बहार है।
श्रम की महिमा क्या बतलाऊँ.............
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रचनाकार:-
बोधन राम निषादराज"विनायक"
सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)
                     

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